🕉️ प्रस्तावना
छत्तीसगढ़ की धरती प्राचीन धार्मिक परंपराओं, आदिवासी संस्कृति और लोक आस्था की समृद्ध विरासत से भरी है। ग्राम सिंगारपुर का माँ मावली माता मंदिर इसी विरासत का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है। यह केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि गाँव की ऐतिहासिक स्मृतियों, पारिवारिक परंपराओं और सामूहिक आस्था का प्रतीक है।

📍 स्थान
सिंगारपुर छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले की भाटापारा तहसील का एक गाँव है।
🌳 जंगल के बीच था माता का स्थान
हमारे पूर्वजों द्वारा बताई गई जानकारी के अनुसार, प्राचीन समय में गाँव सिंगारपुर में अक्सर पंडा (बंजारा) लोग आकर रुक जाते थे। उस क्षेत्र को ग्रामीण अब "पंडाडिपरा" कहते हैं। वहीं से उनका मुखिया गुजर रहा था। वह कुष्ठ रोग अथवा हाथ-पैर से संबंधित गंभीर समस्या से पीड़ित था।
उसी दौरान उसने जंगल में स्थित छोटे जलकुंड के पानी से अपने हाथ-पैर और मुँह धोए। प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुछ समय बाद उसने अपने हाथ-पैर में सुधार महसूस किया।
इस अनुभव के बाद उसके मन में उस स्थान के प्रति विशेष जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उसने विचार किया कि जिस स्थान के पानी के उपयोग से उसे लाभ महसूस हो रहा है, वहाँ अवश्य ही कोई विशेष महत्त्व होगा।
इसके बाद उसने उस छोटे जलकुंड की सफाई की और वहाँ खोजबीन की। इसी दौरान उसे एक मूर्ति प्राप्त हुई, जिसे आगे चलकर माँ मावली माता के रूप में स्थापित किया गया।
मूर्ति प्राप्त होने के बाद उसने श्रद्धापूर्वक उसे स्थापित किया और वहाँ एक छोटा-सा मंदिर बनवाया। इस प्रकार, पूर्वजों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जंगल के बीच स्थित उस छोटे जलकुंड के पास माँ मावली माता के पूजा स्थल की स्थापना हुई।
आज भी मान्यता है कि मंदिर के प्रांगण में स्थित कुंड के पानी में नहाने के बाद माता के दर्शन करने से रोग-दोष सहित सभी दुख दूर हो जाते हैं।
माता की प्रतिमा को स्वयंभू माना जाता है, यानी भक्त उन्हें स्वयं प्रकट हुआ दिव्य स्वरूप मानते हैं। लोक मान्यता यह भी है कि शिव, ब्रह्मा और विष्णु की इच्छा से माता यहाँ प्रकट हुईं।
🛕 मंदिर की प्राचीनता

इस आधार पर मंदिर लगभग 300 वर्ष पुराना माना जाता है। उस समय यह क्षेत्र अविकसित था।
🔱 भैरव बाबा की समाधि
जिस पंडा को प्रतिमा की खोज और स्थापना से जोड़ा जाता है, उसकी समाधि आज भी मंदिर के मेला परिसर में है। समय के साथ लोगों ने इसे भैरव बाबा की समाधि के रूप में मान्यता दी। वर्ष 2026 में इसे भैरव बाबा मंदिर का स्वरूप दिया जा रहा है। इस तरह माँ मावली की पूजा के साथ भैरव बाबा के प्रति आस्था भी इस परिसर का हिस्सा बन गई।
🙏 कुलदेवी और ग्राम देवी
गोंड आदिवासी समाज के परिवार माँ मावली को अपनी कुलदेवी मानकर पूजते आए हैं। सुबह-शाम पूजा की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। प्राचीन काल से गोंड समाज यहाँ और तरेंगा के महामाया मंदिर में पूजा-अर्चना करता रहा है, और आज भी माँ मावली की पूजा उन्हीं गोंड पुजारियों के वंशज करते हैं।

स्थानीय श्रद्धालु माता को ग्राम देवी मानते हैं, जो गाँव की सुख-समृद्धि और रक्षा करती हैं। भक्त परिवार, पशुधन और अच्छी फसल की कामना भी माता से करते हैं।
कालांतर में आसपास के मालगुजारों और स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर का विस्तार हुआ और यह क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
💧 तालाब और बावली
मंदिर के पास का तालाब इस स्थान की पहचान का अहम हिस्सा है। यह केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि मंदिर की ऐतिहासिक स्मृतियों और कृषि परंपरा से भी जुड़ा है।
मंदिर के नीचे एक बावली भी है। मान्यता है कि फसल में कीट-प्रकोप या महामारी फैलने पर बावली का पानी ले जाकर छिड़कने से प्रकोप दूर हो जाता है।
🌾 कृषि परंपरा: तालाब का जल खेतों तक
सिंगारपुर की एक विशिष्ट परंपरा है, माँ मावली माता के तालाब का पानी बाल्टी, लोटे और अन्य पात्रों में भरकर खेतों तक ले जाना। गाँव के लोग हर वर्ष इसे निभाते हैं और इसे सामान्य खेती के काम की तरह नहीं, बल्कि त्योहार की तरह मनाते हैं।
स्थानीय मान्यता के अनुसार यह परंपरा माहू जैसे फसल को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों की रोकथाम की कामना से जुड़ी है। किसान इसके माध्यम से अच्छी फसल और खेती की समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। खेती गाँव की आजीविका का आधार है, इसलिए यह परंपरा सामूहिक आस्था और सामुदायिक एकता, दोनों को दर्शाती है।
🪔 नवरात्रि और माँ मावली माता मेला
नवरात्रि में मंदिर में विशेष उत्साह रहता है। नौ दिनों तक माता के विशेष श्रृंगार के दर्शन के लिए भक्तों का ताँता लगा रहता है और प्रतिदिन सैकड़ों लोग मनोकामना लेकर आते हैं। इन दिनों नौ दिन का मेला भी लगता है, जिसमें धार्मिक आयोजनों के साथ सामाजिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक परंपराओं का आदान-प्रदान होता है। मंदिर, तालाब और भैरव बाबा की समाधि मेला परिसर की पहचान हैं।

हर नवरात्रि पर श्रद्धालु मनोकामना ज्योति कलश जलवाते हैं। हर साल लगभग 10,000 ज्योत जलाई जाती हैं।

पहले नवरात्रि की नवमी को माता के सामने बलि चढ़ाने की प्रथा थी। साधुओं के अनुरोध और प्रशासन के हस्तक्षेप से अब यह बंद कर दी गई है।

🤝 समिति और मंदिर का विकास
अब मंदिर की देखरेख एक समिति करती है। अन्य राज्य के कारीगरों को बुलाकर मंदिर को भव्य रूप दिया गया है। गोंड समाज ने अपनी आराध्य देवी के नाम पर धर्मशाला बनवाई है। नवरात्रि पर मंदिर की व्यवस्था सिंगारपुर के युवा और समिति के सदस्य ही संभालते हैं। हालांकि मेला व्यवस्था ग्राम पंचायत सिंगारपुर देखती है।

ग्राम के सदस्य कुछ वर्षों से नवरात्रि पर मावली महोत्सव भी आयोजित कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ शासन ने सिंगारपुर को मिनी तीर्थाटन एवं पर्यटन स्थल बनाने की घोषणा की थी।

गाँव में विभिन्न समाजों के बनवाए 18 से 20 भव्य मंदिर भी हैं, जैसे अहीर समाज का लक्ष्मीनारायण मंदिर और देवांगन समाज का राम जानकी मंदिर। झेरिया यादव, कुर्मी और सतनामी समाज सहित अन्य समाजों के मंदिर भी इनमें शामिल हैं।
✨ आस्था, विरासत और पहचान
माँ मावली माता मंदिर का इतिहास पूर्वजों से मिली जानकारी, धार्मिक परंपराओं और गाँव की सामूहिक स्मृतियों से जुड़ा है। इस जानकारी को सुरक्षित रखना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपने गाँव के इतिहास, विश्वास और कृषि परंपराओं को समझ सकें।
माँ मावली माता की यह विरासत सिंगारपुर के लोगों की श्रद्धा, परंपरा और सामूहिक पहचान का प्रतीक है।
